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विजयादशमी का सही अर्थ

बचपन से मुझे बताया गया है कि दशहरे के दिन हम प्रभु श्रीराम के रावण को पराभूत कर अयोध्या लौटने के आनंददायी पर्व को हर वर्ष मनाते हैं। यही आम धारणा है। आज यह खयाल आया कि क्यों न इसके बारे में कुछ अलग विचार किये जायें? हम सभी के भीतर भी तो दुर्गुणरूपी रावण और सद्गुणस्वरूप श्रीराम का द्वंद्व चलते रहता है। भले- बुरे के संघर्ष में भले की विजय का भी तो यही पर्व है।

मनुस्मृति में से उद्धरित ये तीन श्लोक मुझे प्रेरणा देते हैं।

काया-वाचा-मने इन दस पापों से मुक्ति पाना ही सच्चे अर्थ में विजयादशमी मनाना होगा।

अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः ।

परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ॥

पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः ।

असम्बद्धप्रलापश्च वाङ्ममयं स्याच्चतुर्विधम् ॥

परद्रव्येष्वाभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् ।

वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥ ( मनुः)

शरीर से किये तीन, वाचा से किये चार और मन से किये तीन पापों का त्याग करना उचित होगा यही इन श्लोकोंमें कहा गया है।

तीन शारीरिक पाप:

अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः । परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ॥ जो वस्तु/व्यक्ति अपनी नहीं है या किसीने उसे हमें दान न किया हो, ऐसी कोई चीज या व्यक्ति की अभिलाषा रखना, बेवजह हिंसा करना या परस्त्री को पाने की इच्छा रखकर उसकी कोशिश करना ये तीन शारीरिक पाप हैं।

वाचा के चार पाप/दोष:

पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः ।असम्बद्धप्रलापश्च वाङ्ममयं स्याच्चतुर्विधम् ॥ औरों के बारे में सदैव झूठ फैलाना और कठोर शब्दों का प्रयोग करना, और सदैव असम्बद्ध तथा अव्याहत बातें करते रहना यही चार वाचा से घटनेवाले चार पाप हैं।

मन से होनेवाले तीन पाप:

परद्रव्येष्वाभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् ।वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥ ( मनुः) किसी और के द्रव्य की अभिलाषा रखना, औरों को क्षति पहुँचाने की कामना/विचार करना, और सदैव झूठी चीजों में स्वारस्य रखना, जैसे अफवाहें फैलाना यही मन के तीन पाप हैं।

रावण को इन्हीं दस पापों के लिए दंडित किया गया। अजेय एवम अमर होने के वर मिलने पर रावण अहंकारी और उन्मत्त हो गया। इसी वजह से वह औरों की चीज वस्तु तथा औरतों का हरण करने में व्यस्त हो गया। उसने सभी के साथ अकारण युद्ध किया, तीन लोकों पर उसने अपने शक्ति का अकारण प्रदर्शन किया और सत्ता स्थापन की। विंध्यपर्वत को ललकारने पर विंध्य ने उसे वाली से युद्ध करने के लिए कहा। (वाली ने उसे युद्ध मे पराभूत भी किया था।) त्रिलोकों में अपना भय फैला कर सभी को रोने से मजबूर करने की वजह से उसका नाम रावण रखा गया। उसने प्रभु श्रीराम की स्त्री (पत्नी) सीता की अभिलाषा की और उसका छल कपट से हरण भी कर लिया। यह उसकी सबसे बड़ी भूल और गलती हुई। औरों के इसके बारे में अवगत कराने पर भी वह अपनी गलती मानने के लिए कभी राजी नहीं हुआ, और आखिर इसी कारण अपने प्राणों से हाथ धो बैठा।

रावण सदैव औरों से कठोर शब्दों में बातें करता था। जो भी उसे उचित सलाह देता, उससे भी कठोर बातें करता। बिभीषण, मंदोदरी, सीता, हनुमान सभी के साथ उसने दुर्व्यवहार किया। हमेशा झूठी बातें और झूठा व्यवहार करता। ऋषि के वेश में जाकर सीता से भिक्षा माँग कर छल से उसने सीताहरण किया। बादमें सीता को झूठ का सहारा लेकर श्रीराम के झूठे शिर को बता कर उसने “मैंने श्रीराम को हराकर उसका वध किया” ऐसा कहकर सीताजी को अपने मायाजाल में फाँसने की कोशिश की। श्रीराम की उसने सदैव भर्त्सना की और उसे कमजोर एवम निर्बल बताने की कोशिश की। रावण ने देवों से वरप्राप्ति कर, देव, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, नाग आदि से अभयप्राप्ति कर ली थी। उसने सदैव मनुष्यगण और प्राणिमात्र को तुच्छ समझकर उनसे अभय नहीं माँगा था। इसी वजह से उसका विनाश भी मनुष्य योनी तथा प्राणियों के द्वारा ही हो सकता था। इसीलिए श्रीविष्णु को मनुष्य रूपी श्रीराम का अवतार ग्रहण करना पड़ा। विश्वरचयिता ब्रह्म की सर्वोच्च रचना मनुष्य की सदैव निंदा करने की और तुच्छ समझने की कीमत उसे चुकानी पड़ी।

वाचा अमूल्य है। प्राणवायु को आत्मस्तुति में व्यर्थ गँवाना उचित नहीं है। लेकिन रावण सदैव अपनी स्तुति में व्यस्त रहता था। अनर्गल भाषा मे अपनी स्तुति तथा औरों की अभद्र भाषा में भर्त्सना में व्यस्त रहता। औरों की संपत्ति की वह हमेशा इच्छा करता, आकांक्षा रखता। उसके भाई कुबेर की सुवर्णनगरी लंका का उसने हरण किया और सभी पराजित राजाओं की संपत्ति भी ग्रहण कर ली। औरों के लिए उसने कभी सदिच्छाएं नहीं रखी और शुभकामनाएं भी व्यक्त नहीं की। सभी का उसने दुस्वास किया और हमेशा औरों के लिए उसने बुरी कामनायें ही रखी। अपनी शक्तियों का उसने दुरुपयोग करते हुए मायाजाल फैलाया। सीता को उसमें फाँसने की कोशिश की , अपने गर्व में अंधा हो गया।

इन्हीं दस दुर्गुणों से भरे रावण को दशानन माना गया है। वास्तविकता में उसे दस सर नहीं, दस बड़े दुर्गुण थे। इन दस दुर्गुणों का नाश करके इनपर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में हम विजयादशमी मनाते हैं।

आज इस पावन त्योहार के सुदिन मेरी आप सभी को शुभकामनाएं तथा आपसे विनम्र प्रार्थना की आप और मैं सदैव इन दशदुर्गुणों से बाधित न हों। तभी जाकर हम विजयादशमी को सही तरह से मनाएँगे।

जय श्रीराम

By abchandorkar

Consultant Interventional Cardiologist, Pune, India

96 replies on “विजयादशमी का सही अर्थ”

आपल्या मनातील रावणाच खुप चांगलं वर्णन. रावणानं मनुष्य व प्राणीमात्रांना तुछ समजून त्यांची भीती बाळगली नाही, हे आज समजलं. विजयादशमीच्या हार्दिक शुभेच्छा.

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हो ना! म्हणून च श्री विष्णूने मनुष्याच्या योनीत अवतार घेऊन जनावरांचे सैन्य गोळा केले व लंकेवर विजय मिळवला

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मनुष्य के स्वभाव में बसे दुर्गुण उ से अपना हीं शत्रू बन नें पर मजबूर करते हैं और उसे अप ना ही विनाश करने पर विवश करते है… हमें हमेशा इन दुर्गुनो से स्वयं की रक्ष कर उन्नती का मार्ग सिधाराना चाहिए…..इन बातोन का उचित ए वं सुंदर वर्णन आप ने अपने शब्दो में किया हैं….. विजयादशमी के इस शुभ अवस र पर आप सभी को हम बहोत शुभ कामना ये देते हैं…..

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एकदम सही कहा, रावण भी हमीं में है, और श्रीराम भी…. आपको तय करना है किसकी जीत होने देंगे

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विजयादशमी के पावन अवसरपर आपने जो
सही मायनो मे रावण और राम का वर्णन किया वह
अत्यंत महत्त्वपूर्ण और रोचक है..सरजी🙏
मनुस्मृती का उदाहरण भी उतना ही सहज और
अर्थपूर्ण है… ये नव विचार हर एक को अपनाना जरूरी है..
आपको और आपके परीवार को ढेर सारी शुभकामना☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️

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मन से रावण जो निकाले
राम उस्के मन मे है

सुंदर लिखाण,
अस्खलित हिंदी वाचताना अधिक भावलं

डॉ चांदोरकर , परिवार
आणि त्यांच्या चाहत्यांना
विजयादशमीच्या निरामय शुभेच्छा 🌻🏵️🌻

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दशहरे की सही संकल्पना (दस दुर्गुणोंपर विजय प्राप्त करना) सरल भाषामे विषद करनेके लिये धन्यवाद ।

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बहुतही सुंदर हिंदीमे लिखा है। रावण पहले एैसा नही था , उसने कठोर तपस्या करके शिवजीसे वरदान पाया था । लेकिन बादमे वह अहंकारी बन गया और यही उसके विनाशका कारण बन गया । भगवान करे की ये अहंकार हमे न वशमे करे , क्योंकी हम कुछ नही करते वह परमात्मा हमसे करवा लेता है । हम केवल निमित्तमात्र है । सदा अच्छाही काम करे और जितना हो सके दूसरोंकी मदद करे । और यही तो तुम हमेशा करते रहे हो, भगवान तुम्हे सदैव अच्छे फलही देगा।

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बिल्कुल सही है। रावण को वरदान मिलने के बाद वह अजेय और अमर बन गया। इसका घमंड उसपर सवार हो गया और फिर उसने सारे गलत काम किये। अहंकार त्याग देता तो रामायण ही न घटता

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Really nice article.Immensely informative and explains the true essence of dussera.Must read for all youngsters to understand the importance of dussera

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Brilliantly summarized! But I wish more people read it in depth and take some learnings… I will love to share further…

“रावण सदैव अपनी स्तुति में व्यस्त रहता था। अनर्गल भाषा मे अपनी स्तुति तथा औरों की अभद्र भाषा में भर्त्सना में व्यस्त रहता।”
This is the worst sin that an arrogant person indulges in, that leads to his or her fall. The end of such people are bad and many times people surrounding such people are unnecessarily tortured.

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True. Being self centred and having got a boon of invincibility from Shiv, Ravan indulged in all his misdeeds which ultimately led to his downfall. That’s the take home, really. Had he stayed humble and grounded after his penance and achieving the boon, he would have undoubtedly achieved Godhood and immortality in our scriptures. There are parallels to this in other religions as well.

In the Bible, Lucifer is also the fallen angel….. And Judas was one of the apostles too…..

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In short what I deduce from your thoughts on Rawan is that we should be devoid of false egos and try and develop our mind to be strong which does not get affected by other persons. This I feel is possible if we study karma sidhant. Your analysis on Rawan makes interesting reading no doubt.

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Thanks Sujata. By all accounts, Ravan was an ascetic and a Shivbhakt. His transformation to an exploitative tyrant occurred when he was granted the boons by Shiv himself. His ego and arrogance led to his downfall

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Very nicely put up with all details…most importantly its very valid to live Happy life in current era if we delete these 10 things…Happy Dussehra

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Great!!!
विजयादशमी बद्दल एवढी माहिती नव्हती.
खुप सुंदर. अहंकार हा सर्वविनाशी असतो.
एवढी सुंदर माहिती दिल्याबद्दल खरच धन्यवाद!!
🏹🏹☺

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Great!!!
विजयादशमी बद्दल एवढी माहिती नव्हती.
खुप सुंदर. अहंकार हा सर्वविनाशी असतो.
एवढी सुंदर माहिती दिल्याबद्दल खरच धन्यवाद!!
🏹🏹☺

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Sir khup Chan mahiti dilit ani khup Chan lihle ahe. Vijayadashmi Dashera sanacha paripurn arthbodh zala.

☘️🍁 “विजयादशमी” च्या हार्दिक शुभेच्छा ☘️🍁

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विजयादशमी चे महत्व सांगणारा अतिशय सुंदर लेख !काया, वाचा आणि मनाने होणारी पापेआणि त्याचे दमन याविषयी केलेले मार्गदर्शन सर्वांना अंतर्मुख करणारे. या सर्व पापांपासून मुक्ती मिळविणे, खऱ्या अर्थाने विजयादशमी साजरे करणे होय !!

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NAVARATRI, DURGA PUJA AND WOMEN EMPOWERMENT
Navratri or the nine sacred days is celebrated with fervour & festivity all over India & in every Hindu community the world over. These nine days are dedicated solely to Maa Durga (Goddess Durga) & her nine avatars. Durgã, the unassailable, is one of the most impressive, beautiful & formidable warrior goddesses of the Hindu pantheon. Her story is the story of victory of good over evil. As ‘Mahishasurmardini’ she slays the buffalo demon who threatened the stability of the cosmos. She is also the Divine Mother protecting us all from evil & misery in every form. Though she is a Hindu deity Durgã is not the quintessential Hindu woman. She stands outside the stereotype of Hindu society. Let us understand the religious & cultural aspect of Durgotsav and then dwell on its irony.
The Religion
Navadurga (Nine forms of Durga), are nine manifestations of the Goddess Durga in Hinduism, especially worshipped during the festival of Navratri where each of the nine manifested forms are consecutively venerated throughout all the nine nights. These nine manifested forms of Goddess Durga are: Shailaputri, Brahmacharini, Chandraghanta, Kushmanda, Skandamata, Katyayini, Kaalratri, Mahagauri and Siddhidhatri.
Let me briefly tell you about each of these nine divine forms to make you aware of what all aspects of womanhood are celebrated by Hinduism:

Shailaputri – After self-immolation in Her form as Sati, the Mother Goddess took birth in the house of King of Mountains, as the daughter of Lord Himalaya. Her vehicle is a bull and is hailed as Vrishabhda

Brahmacharini  – The Mother Goddess took birth at the home of Daksha Prajapati, as his daughter, Sati, who was born to marry Shiva. This unmarried form of the Mother Goddess is worshipped as Brahmacharini.This form is the embodiment of knowledge & teaching.

Chandraghanta – Goddess Chandraghanta is the married form of the Mother Goddess. After getting married to Shiva, Goddess Mahagauri started adorning her forehead with a half moon(Chandra) shaped like a bell(Ghanta) due to which, she became known as Goddess Chandraghanta. This form of the Mother Goddess is ready for war and is seen with all her weapons, to protect the peace & welfare of Her devotees. It is believed that the sound of the moon-bell on her forehead drives all types of evil away from Her devotees. She rides a lion & one can experience fearlessness & bravery by worshipping her.

Kushmanda – After taking the form of Siddhidatri, the Mother Goddess started living within the Sun thereby liberating the Sun’s energy to the universe. Since then, this form of the Goddess has been known as Kushmanda, namely for her power & capability to live inside the Sun. The glow & radiance of her body is as luminous as that of the Sun. She in her eight-arms, holds weapons, rides a tiger & is the cheerful Goddess! She created the universe in the flash of Her smile & is believed to bestow siddhis(supernatural powers) & niddhis(wealth) to Her devotees.  

Skandamata – In her form as mother of the God of War, Lord Skanda(also known as Kartikeya), she is known as Goddess Skandamata. She mounts the ferocious lion & carries baby Skanda in her lap. Devotees who worship this form of the Mother Goddess get the added benefit of blessings of Lord Skanda.

Katyayini – The daughter of sage Katyayana, who incarnated to help Devas to destroy demon Mahishasura is worshipped as Goddess Katyayini. She rides on a magnificent lion & is depicted with four hands.

Kaalratri – This is the fiercest & the most ferocious form of the Mother Goddess, in which she manifests to destroy the demons, Shumbha and Nishumbha. Her complexion is dark black & She rides on a donkey. She is depicted with four hands. Her right hands are in Abhayamudra & Varadamudra. She carries a sword & deadly iron hook, the Kharga in her left hands & a demon head & scimitar in the right. This form destroys all darkness & one can scare away the demonic forces by worshipping her.
Mahagauri – Goddess Shailaputri at the age of sixteen was extremely beautiful & blessed with a fair complexion. Due to her extremely fair complexion, she was known as Goddess Mahagauri. She wears white clothes, has four arms holding a musical instrument in the left & a trident in the right. Her right hand is in the pose of allaying fear & blessing her devotees.

Siddhidhatri – In the beginning of the universe, Lord Rudra worshipped the un-manifest or nirakar form of the Mother Goddess, Adi Parashakti for creation. As Adi Parashakti, the Mother Goddess was pure energy & had no form. She thus appeared in the form of Siddhidhatri from the left half of Shiva. She bestows all types of siddhi(supernatural powers) to her devotees & hence is worshipped by humans, ghandarvas, asuras & devas alike. Siddhidatri has the eight powers – Anima, Mahima, Garima, Laghima, Prapti, Prakambya, Ishitva & Vashitva which can be attained by her grace, this half-Shiva & half-Shakti form of Ardhanarishwar is granted by her.

The culture…
Durga is the slayer of Mahishasura, the demon epitomizing all kinds of evils. She is also the supreme mother goddess, protecting all those who seek her protection. In totality, she embodies Shakti—the female force, latent in each human being, which manifests itself variously. It is she to whom the male God turns to vanquish evil. So, while Bengalis first pay homage to her valour , they then welcome her as a daughter visiting her natal family. They essentially seek her blessings as the supreme mother. Durga Puja thus is not just a Puja but a cultural extravaganza!

The irony…
In a country like India where Maa Durga is worshipped & women form the backbone of the society, India is still fighting several demons of crimes against women like human trafficking, rape, sex-selective abortion, dowry, & child marriage to name a few. We worship the girls in kanya pujan but we don’t want them to be born in our family & if born, we deprive them of education, equal rights & stature. They aren’t treated as the princess of their parental house to begin with & life only gets tougher later on. We want power from Durga, wealth from Lakshmi, knowledge from Saraswati. We want everything from the women but we don’t want the women!

Woman, considered to be the creator, is worshipped in the Navratris but the bitter truth is that that only idols are worshipped not the real ones. We worship Maa Durga & seek shakti or power & then the society as a whole perpetrates untold miseries on women. Women born in this world are still unsafe & clearly at a disadvantage.

Over the years, however, Durga’s symbolism for women in India has been undergoing some change. Increasingly, women are looking upon her as a symbol of feminine power, rather than a divine mother, an inspiration to reclaim rights that society has, over the centuries, deprived them of. The great thing about the Hindu tradition is that we can personalize the divine to suit our needs & true women empowerment against all forms of evil – these evils cannot go hand in hand with the devotion to Mother Durga!

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Wonderful post. All evils are in the mind, and it’s only through awareness, we can defeat the evils. Greed, lust, anger, attachment, pride and envy are the 6 main evils which plagues the mind. Through awareness and constant deliberate efforts, one should strive hard relentlessly to overcome these evils. As the light of wisdom and knowledge graces the mind, the darkness of the vices will be forced to disappear. Jai Sri Ram 🙏🙏🙏

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very well said . Our boons can become our downfall if not observed

Iread this somewhere so sharing it too

The 10 heads of Ravana represent ten negative emotions, a human life owns- Ego or ahankara; Attachment or moha; Regret or paschyataap; Anger or krodha; Hatred or ghrina; Fear or bhaya; Jealousy or irshya; Greed or lobha; Lust or kama and Inertia or jaddata.

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Quiet an enlightened view from a complete different and detailed perspective, will go life long with the readers , especially for getting rid of the “Ravana” elements within us …… Dr. Khup Shubhechhaa…

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Very enlightening thoughts
Most of the battles we fight are with internal demons. That fight is more difficult and complicated than any war fought on battle field.
Thank you for sharing

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हरे कृष्ण हरे राम!! रामायण में गीता!! इतने सारे कमैंट्स पढ़ कर लगा कि मैं देर से सो कर उठा हूँ! फिर जब तारीख देखी तो स्पेस टाइम ओरिएंटेशन सही हो गया!!☺️

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Very Nice & Informative 👍

मराठी अस्मितेची मराठी शान
मराठी परंपरेचा मराठी मान
आज सोन्यासारखा दिवस घेऊन येईल
आयुष्यात तुमच्या सुख, समृद्धी आणि समाधान”
💐शुभ दसरा💐
💐विजयादशमीच्या तुम्हास व तुमच्या परिवारास हार्दिक शुभेच्छा💐

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Sir
Ten evils description is done very rightly .. thanks and appreciate
*Happy Dashera to your and your family*
☘️☘️विजयादशमीच्या आपणास व आपल्या कुटुंबास मन: पुर्वक हार्दिक शुभेच्छा ☘️☘️

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Really insightful perspective on dussera celebrations. This has change my thoughts about the festival celebration. Thanks for writing such beautiful blog.Keep writing and sharing with us

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सर, रावणाचे दुर्गुण व त्यामुळे झालेली शिक्षा याचे योग्य वर्णन आहे.

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A refreshingly fresh perspective.
The discussions for and against by eminent learned readers of your blog also made interesting reading.
However, there remains a truth & subtle bias even in the most accomplished storytellers.
It’s their point of view, there interpretation. The idea of Vilification and glorification always lies embedded within.
The point is, even at the pinnacle of one’s achievements & despite being all powerful, one is still an examinee and hence needs to keep oneself grounded at all times.
The idea is to refrain from guilt which can be very relative & egocentric.
One’s thoughts and actions and the guilt dictate the state of our neurotransmitters which is the difference between health and disease.

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