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बस यूँही……

An urban environment looks so very different in the stillness, serenity and silence of the night. The same area in daytime would be dynamic, crowded and abuzz with life. Late at night it is recovering from the rigours of the activities of the previous day.

दायमी– चिरंतन, सर्वकालिक

हसरत– इच्छा, कामना

बेइंतेहा– असीम, अंतहीन

By abchandorkar

Consultant Interventional Cardiologist, Pune, India

27 replies on “बस यूँही……”

इतना भी मत तड़पा ये बेइंतहा तन्हा राहों पर,
दायमी जलाए ये हसरतों के दिए,तुझे पाने से पहले बुझ न जाए,
अब खुद से भी डर लगता है कहीं खुद में ही न समा जाए….

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रातें भी अब लंबी लगने लगी,कुछ बोझ सा दिमाग पे छा गया,
अंधेरों से डर कहां हमे, बस ये तेरा बेइंतहा इंतजार सताए गया,
हसरतों के चिराग जलाते गए पर तन्हा दिल बुझता ही गया….

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wow…..beautiful photo in monochrome with matching words…..👌👌

I have tried to write my thoughts which were painted in my mind while watching the photo…..

दिनभर बहते नजरों के कई साये…..
जब रात के अंधेरे मे छिप जाते हैं…..
औंर अंजान अकेला कोई उस तनहाई मे गुनगुनाता हैं अपने मन का गीत…..
तब उस रस्तेको मील जाता हैं एक अपनासा कोई…..
मील जाती हैं उसे एक नयी मंजिल…..

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Please allow me to add some more…

घनघोर अंधेरा, ठंडी सी हवाएं,राहें भी तन्हा, में भी तन्हा,
संगीत हवाओं का,कुछ हमने गुनगुनाया,कुछ राहें बोल उठी,
अंधेरा ही सही पर तन्हा रात हमारी रंगीन हो उठी..

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