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Environment Human nature Serenity

बस यूँही…….


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It is always a source of amazement to me, the near universal denial of what is certain and unchangeable: every being in the universe is guaranteed the journey of life will definitely draw to an end, while someone else starts on theirs. The acceptance of the inevitable as a natural culmination might just reduce the fear it always manages to invoke. Our ancient sages and their priceless advice touches upon the necessity of (& ways to) defeat this fear….
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#Iter_Vitae,
#Journey_Of_Life,
#The_Unchangeable_Truth

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Introspection Serenity Sunsets

बस यूँही……

The skies were suffused for a fleeting moment with an unreal celestial magical show just after sunset. I could feel the leash I once held so often tug at my hand insistently as my furry son grew impatient at my standing still admiring His painting skills. I could sense his presence, after all I was proximate to his forever resting place. He had, as was his habit, moved on ahead and seemed to stop and look back to see if I would follow him, which I definitely will, another day.

I was reminded of this sublime piece of verse:

Walking into a golden sky

By D I Harrison

Walking into a golden sky

When I start and walk alone,

Rain, dark storms folding about me,  

When I need  a person – you –

And you were just here,

Now departed,

I shall never walk alone,

For you are here, but just now

You’re at a different here,

And yet here the silver lark’s song is heard

(by us both).

#Remembrance,

#Solitude,

#Unconditional_Love

The picture has been shot without any filters and has not in any way been postprocessed.

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Human Tales Introspection

राष्ट्रकवि को नमन

मैं जब नौवीं कक्षा में था तब हमें हिंदी पढ़ाने के लिए आशा लखनपाल आया करती थी। वे जुहू में जानकी कुटीर में रहती थीं। उन्हींकी सिखाई यह कविता आज संयोगवश याद आ गई।

आज हिंदी भाषा के एक महाकवि की १३६ वीं वर्षगाँठ है। मैथिलीशरण गुप्त का इस धरा पर इसी दिन ईसवी सन १८८६ में अवतरण हुआ था। हिंदी भाषा मे खड़ी बोली में काव्यरचना कर उन्होंने उस काल के अन्य प्रसिद्ध कवियों से अलग स्थान बनाया था।

हिंदी साहित्य जगत के धूमकेतु, राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत, काव्य-शिरोमणि पद्मभूषण राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्तजी की १३६ वी जयंती पर उन्हें विनम्र नमन!

राष्ट्रीयता, बंधुत्व, मानवता, नारी सशक्तिकरण से ओत-प्रोत आपकी कालजयी चिरंजीवी, चिरंतन रचनाएं समाज एवं राष्ट्र-निर्माण हेतु इस देश के लिए सदैव प्रेरणा-स्त्रोत रहेगी…

अब इसी कविता को देखिए: यशोधरा नामसे रचित गुप्त जी का यह प्रसिद्ध प्रबंधकाव्य है। गुप्तजी ने इसकी रचना अपने अनुज सियारामशरण गुप्त जी के अनुरोध पर की थी। इस महाकाव्य में गौतम बुद्ध के गृहत्याग को केंद्र बनाकर गुप्तजी ने इसे राजकन्या यशोधरा के परिप्रेक्ष्य से कथन किया है।

इसमें गुप्तजी ने वर्णन किया है वो है राजकुमार सिद्धार्थ के द्वारा पत्नी एवं परिवार को त्यजने की घटना के पश्चात राजकुमारी यशोधरा अपनी सखी से उनके मन की पीड़ा की अभिव्यक्ति। पुरुषप्रधान समाज में रहकर हम हमेशा सिद्धार्थ के बारे में, उसके वैराग्य, त्याग और उनके ज्ञानप्राप्ति के बारे में ही सोचते हैं। लेकिन इसी घटना का दूसरा, राजकुमारी यशोधरा का  परिप्रेक्ष्य हमारे लिए सादर किया है। इस स्त्री पर हुए अपमान एवम इस पीड़िता के विचारों को सामने रखा है।

युवराज सिद्धार्थ जरा (वृद्धावस्था), रोग तथा मृत्यु के दर्शन से व्यथित हो कर पूर्ण सत्य तथा अमृत तत्व की खोज में अपनी सोयी हुई पत्नी युवराज्ञी यशोधरा तथा पुत्र राहुल को छोड़कर चुपके से निकल जाते हैं। (इसे महाभिनिष्क्रमण कहते हैं)

जागने के बाद युवराज्ञी को सिद्धार्थ के चले जाने की जानकारी मिलती है। अब उसका वार्तालाप अपनी सहेली के साथ इसी विषय के संबंध में जो होता है, उसे गुप्तजी ने कितना सुंदर दिखाया है, पढिये।

यशोधरा

सखि, वे मुझसे कहकर जाते

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

               मुझको बहुत उन्होंने माना
               फिर भी क्या पूरा पहचाना?
               मैंने मुख्य उसी को जाना
               जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
               प्रियतम को, प्राणों के पण में,
               हमीं भेज देती हैं रण में –
               क्षात्र-धर्म के नाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               हुआ न यह भी भाग्य अभागा,
               किसपर विफल गर्व अब जागा?
               जिसने अपनाया था, त्यागा;
               रहे स्मरण ही आते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
               पर इनसे जो आँसू बहते,
               सदय हृदय वे कैसे सहते?
               गये तरस ही खाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
               दुखी न हों इस जन के दुख से,
               उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
               आज अधिक वे भाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               गये, लौट भी वे आवेंगे,
               कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
               रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
               पर क्या गाते-गाते?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

– मैथिलीशरण गुप्त

सम्पूर्ण कविता में यशोधरा का सबसे महत्वपूर्ण आक्षेप सिद्धार्थ के उन्हें बिना बताए जाने से है। उसका कहना है कि उसके पति ने उसे समझा ही नहीं। उसकी सम्मतिसे चले जाते तो क्या अच्छा नहीं होता? लोगों में तरह तरह की बातें तो नहीं बनती। जब क्षत्रिय औरतें खुद पति को रण में भी शस्त्रों के साथ सुसज्जित कर खुशी से क्षात्र धर्म निभाते भेजती हैं तो सिद्धार्थ के पथ में वह बाधा क्यों बनती? यशोधरा के मनमें पति के छुप छुप कर जाने से जो ठेस पहुँची है उसीका यथार्थ वर्णन गुप्तजी ने किया है।

पुरुषप्रधान वैचारिकता से दूर होकर इस घटना को राजकन्या यशोधरा के परिप्रेक्ष्य से कथन करना और वह भी इतने स्वाभाविक, सरल शब्दोंमें , किसी साधारण कवि के बस की बात ही नहीं है।

गुप्त जी चेतना प्रवण कवि थे। उन्होंने अपनी कविताओं में उन नारियों को प्राधान्य दिया जो सदैव उपेक्षित व्यक्तित्व थीं। जैसे कैकेयी, मंथरा, उर्मिला और यशोधरा। यशोधरा भी एक अप्रतिम चरित्र प्रधान काव्य है। यशोधरा सिद्धार्थ के कृत्य को नारी जाति का अपमान मानती हैं।

गुप्तजी का स्थान हिंदी कवियों में निश्चित ही सर्वोच्च स्तर पर ही रहेगा। आज के युग में उपेक्षित नारियों के परिपेक्ष्य को उन्होंने एक नए, स्वस्थ दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। अंतमें जब सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बनकर पुनः यशोधरा से मिलने आते हैं तो वे अपने किये की क्षमा पत्नी से माँगते हैं। इस तरह से मैथिलीशरण गुप्त जी की ये श्रेष्ठ कृति है जो सामाजिक नवचेतना का प्रतीक है। ऐसे महान कवि को मेरा उनके जन्मदिवस पर विनम्र नमन।

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Nightscapes Pure joy Serenity Sunsets

बस यूँही…….


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The beauty of each Sunset is truly ephemeral, other wordly and unforgettable despite its evanescence.
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The interplay between the ever changing hues and the fading light from a sun that has set for a well deserved rest at night always fascinates me. I feel blessed God granted me the privilege to be alive to witness the recurring miracle unfold in front of my eyes every single time.
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#Sunsets,
#Sunset_Photography ,
#Different_Perspective ,
#Daily_Dose_of_ecstacy
#Daily_Miracles,
#The_Celestial_Painter,
#Nature_Tales
#Nature_photography
#Beauty_Around_Us

बेखुदी: अपने आप में न रहना, बेसुधी,

मुन्तजिर: प्रतीक्षा करनेवाला

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Lata Mangeshkar Marathi Poetry Sad Songs

कोंडमारा आणि कुचंबणा…

राजकवी भा रा तांबे यांनी लिहिलेल्या कविता वाचणे म्हणजे माझ्या बुध्दीला खाद्य मिळते!

इतक्या लयबद्ध आणि गेय कविता इतर कोणत्याही कवीची असेल असे मला वाटत नाही. मला त्यांची कविता वाचताना (म्हणजे खरे तर मी मनातल्या मनात गात असलेली कविता ऐकताना) जेव्हढा निखळ  आनंद मिळतो तसा इतर कवींच्या कवितेत सापडत नाही.

आता ही एक कविता घ्या: सर्व मराठी रसिकांच्या मनात गेली ५० वर्षे या कवितेने (आणि त्याच्या गायनाने) अक्षरशः अधिराज्य केले आहे. https://youtu.be/UC3zFtUtS00

ह्या कवितेचे दोन अवतार आहेत: जास्त ज्ञात असलेले लतादीदींनी गायलेले गाणे आणि विश्वनाथ बागूल यांनी गायलेले नाट्यगीत! देशकार या रागात वसंत प्रभू यांनी बांधलेली अप्रतिम चाल आणि त्या सुंदर चालीवर स्वरसाज चढवला आहे भारतरत्न लता मंगेशकर यांनी.

मराठी ही एकमेव भाषा आहे ज्यात चित्रपट संगीताशी बरोबरी किंबहुना त्यावर सरशी करणारे दोन प्रकार आहेत: नाट्यसंगीत आणि भावगीते! चोखंदळ रसिकांच्या मनात त्यामुळे कायम आनंदोत्सव अव्याहतपणे चालू आहे- सुरांचा जल्लोष! मधुर या शब्दाचे कोतेपण दाखवणाऱ्या त्या खळखळून वाहणाऱ्या स्वर्गीय सुरांच्या प्रपातात आपण नुसते नखशिखांत चिंब भिजून जायचे. १९५०-७० च्या काळात किती चिरंतन निर्मिती करून ठेवली आहे या निगर्वी कलाकारांनी- एकापेक्षा एक सरस वाटावी अशा अलौकिक रचना, अगदी खेळण्यांच्या किंवा मिठाईच्या दुकानात गेलेल्या लहान मुलाच्या मनांत होईल तसा संभ्रम निर्माण रसिकांच्या मनात व्हायलाच पाहिजे!!

कळा ज्या लागल्या जीवा, मला की ईश्वरा ठाव्या !
कुणाला काय हो त्याचे ? कुणाला काय सांगाव्या ?

उरी या हात ठेवोनी, उरींचा शूल का जाई ?
समुद्री चौकडे पाणी, पिण्याला थेंबही नाही

जनांच्या कोरड्या गप्पा, असे सारे जगद्बंधू !
हमामा गर्जनेचा हो, न नेत्री एकही बिंदू

नदीला पूर हा लोटे, न सेतू ना कुठे नावा,
भुतांची झुंज ही मागे, धडाडे चौकडे दावा

नदी लंघोनि जे गेले, तयांची हाक ये कानी,
इथे हे ओढती मागे, मला बांधोनि पाशांनी

कशी साहू पुढे मागे, जिवाला ओढ जी लागे ?
तटातट्‌ काळजाचे हे तुटाया लागती धागे

पुढे जाऊ ? वळू मागे ? करू मी काय रे देवा ?
खडे मारी कुणी, कोणी हसे, कोणी करी हेवा !

१९२२ साली तांब्यांनी ह्या कवितेची निर्मिती अजमेर येथे केली होती. त्यानंतर सुमारे २५-२६ वर्षांनी आचार्य अत्रे यांनी पाणीग्रहण हे नाटक लिहिले आणि त्यात तांब्यांची ही कविता नाट्यगीत म्हणून वापरली. यानंतर आणखी दोन दशकांनंतर ह्या नाटकाला पुनरुज्जीवन मिळाले, विश्वनाथ बागूल आणि बकुळ पंडित यांनी या नाटकात प्रमुख भूमिका केल्या आहेत. नव्याने निर्मितीला नाटकाला संगीत दिले मराठी संगीतकरांच्या पंगतीत अतिशय वरच्या स्थानावर असलेल्या खळेकाका यांनी. श्रीनिवास खळे यांनी अक्षरशः संगीताची आयुष्यभर तपश्चर्या केली, आणि माझ्यासारख्या कानसेनांना कायमचे उपकृत करून ठेवले आहे की नाही? बागुलांच्या आवाजात ह्या गाण्याची एक वेगळीच झलक दिसून येते, ती पहा: https://youtu.be/owtiATYXDSQ

हे नाट्यगीत कितीही सुश्राव्य असले तरी मला लतादीदींनी त्यांच्या अद्वितीय आवाजात केलेली याची पेशकारी इतकी हृदयंगम आहे की त्यापुढे खरेच मला नाटकातील पद (माफ करा बागूल बुवा आणि खळेकाका मला) किंचित फिकेच वाटते.

काव्य किती अर्थपूर्ण असावे त्याचा उत्तम नमुना आहे. वेदना किती सहन कराव्या, माझ्या वेदनेची तीव्रता फक्त मी आणि ईश्वर जाणतो. मी ते स्पष्ट बोलूही शकत नाही आणि मला माहीत आहे की इतर कोणालाही त्याचे सोयरसुतक नाही. वरवरची मलमपट्टी आणि खोटी सहानुभूती देऊन माझ्या अंतरीचे दुःख दूर कसे होईल? पुढील ओळीत मला Rime of the Ancient Mariner मधील Water water everywhere and not a drop to drink चे स्पष्ट प्रतिबिंब दिसते. राजकवी तांबे यांनी संपूर्ण कवितेत इतरांकडून न मिळणाऱ्या सहानुभूतीमुळे निर्माण झालेल्या द्विधा मनस्थितीचेच वर्णन केले आहे. त्यामुळे निर्माण झालेले मनातले भावनांचे आणि विचारांचे काहूर स्पष्ट दिसते. दुःखात आणि वेदनेच्या एकाकी पडणे, कोणाकडून ही दिलासा न मिळणे, हे त्यांना जास्त क्लेशदायक होते आहे.

नदी लंघोनी जे गेले तयांची हाक ये कानीं,
इथे हे ओढिती मागे मला बांधोनी पाशांनी.

ह्या ओळी कवितेचा गाभाच आहेत. जे आपले सखेसोबती, नातेवाईक, आयुष्य संपवून पैलतीरावर पोचले आहेत, ते मला पलिकडे बोलावताहेत आणि सांसारिक पाश अजूनही ऐलतीरावर बांधून ठेवताहेत अशी एक विचित्र ओढाताण निर्माण झाली आहे.

लोकहो, मला खूप आवडलेली कविता आणि त्यावरची दोन अजरामर गीते… माझी पावसाळी सायंकाळ मस्त गेली! https://youtu.be/-SqNCHkj050

तुम्हांला आवडते का पहा…. काळजी घ्या आणि पावसाळ्याची मजा घ्या

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Jagjit Singh Sad Songs Uncategorized

The indescribable hurt and void…

This is one of most favourite songs that I’ve loved ever since I first laid my hands on the album Saher, just over 20 years ago.

Jagjit Singh remained the most prolific musician in India to produce so many albums in 3 decades of really active performing career. Little wonder he has the highest sales amongst the non filmy genre. He actually ended up selling more records than anyone else in Indian music history.

His selection of wonderful pieces of poetry from relatively unknown poets ensured his fame and success would rub off on to them and they could bask in the reflected glory, too. So many shayars benefited by his generosity.

This ghazal brings in the pain of longing, of separation , of loneliness so poignantly, it brings more than a tear to my eyes every time I hear it. The composition has a touch of class. Classical Jagjit Singh!

This is truly the quintessential Jagjit Singh at his very best. https://youtu.be/HzOFJXhpiV4

The lyrics by Meraj Faizabadi are sublime. Very meaningful and touching. The true essence of pain of parting and longing is brought out beautifully.

तेरे बारे में जब सोचा नहीं था
मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था

तेरी तस्वीर से करता था बातें
मेरे कमरे में आईना नहीं था

समंदर ने मुझे प्यासा ही रखा
मैं जब सहरा में था प्यासा नहीं था

(सहरा  = रेगिस्तान)

मनाने रूठने के खेल में हम
बिछड़ जाएँगे ये सोचा नहीं था

सुना है बंद कर लीं उसने आँखें
कई रातों से वो सोया नहीं था

गुज़र जा इस तरह दुनिया से ‘मेराज’
कि जैसे तू यहाँ आया नहीं था

-मेराज फ़ैज़ाबादी

A ghazal that sounds the same on the disc as well as in a live concert. https://youtu.be/GAalfyLJ7aQ

Love these bitter sweet lines , an admission of contrition, even of guilt…

मनाने रूठने के खेल में हम,
बिछड़ जाएँगे ये सोचा नहीं था..

Just savour each word and line as it rolls over your ears into your mindspace. It will definitely leave you more pacifically inclined after hearing the melody.

तेरे बारे में जब सोचा नही था,
मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था..

Here is to every lover of poetry and music. My life is so much the richer thanks to both. Have a great day ahead, folks, as the rains finally found us

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Unconditional love

बस यूँही…..


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I was reminded of my furry friend, my quadruped son last evening, out of the blue.
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My memories of a noble, loving and sentient being brought back to the fore. Memories kept filed away in the sacred recesses of my mind.
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I was reminded of a poem by Pablo Neruda, “A Dog Has Died….”
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My dog has died.

I buried him in the garden

next to a rusted old machine.

Some day I’ll join him right there,

but now he’s gone with his shaggy coat,

his bad manners and his cold nose,

and I, the materialist, who never believed

in any promised heaven in the sky

for any human being,

I believe in a heaven I’ll never enter.

Yes, I believe in a heaven for all dogdom

where my dog waits for my arrival

waving his fan-like tail in friendship.

Ai, I’ll not speak of sadness here on earth,

of having lost a companion

who was never servile.

His friendship for me, like that of a porcupine

withholding its authority,

was the friendship of a star, aloof,

with no more intimacy than was called for,

with no exaggerations:

he never climbed all over my clothes

filling me full of his hair or his mange,

he never rubbed up against my knee

like other dogs obsessed with sex.

No, my dog used to gaze at me,

paying me the attention I need,

the attention required

to make a vain person like me understand

that, being a dog, he was wasting time,

but, with those eyes so much purer than mine,

he’d keep on gazing at me

with a look that reserved for me alone

all his sweet and shaggy life,

always near me, never troubling me,

and asking nothing.

Ai, how many times have I envied his tail

as we walked together on the shores of the sea

in the lonely winter of Isla Negra

where the wintering birds filled the sky

and my hairy dog was jumping about

full of the voltage of the sea’s movement:

my wandering dog, sniffing away

with his golden tail held high,

face to face with the ocean’s spray.

Joyful, joyful, joyful,

as only dogs know how to be happy

with only the autonomy

of their shameless spirit.

There are no good-byes for my dog who has died,

and we don’t now and never did lie to each other.

So now he’s gone and I buried him,

and that’s all there is to it.


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#Memories,
#Loyalty,
#Unconditional_Love,
#Never_Forgotten

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KK Sad Songs

A grim foreboding

Late last evening someone posted the searing news that cut like a hot knife would through butter, to the soul, an unbelievably painful and mortal blow. I know someone who was attending his live concert at Nazrul Mancha in Kolkata last evening and one of the songs he performed there , in retrospect looks so different just a few hours later. A recording made of that song promptly appeared on the social media and surely has gone viral by now, thanks to the macabre prescience it seems to portend. Amazing, how things work out sometimes… https://www.facebook.com/100002576490413/posts/5027792013983299/

The song, composed by Leslie Lewis, with lyrics by Mehboob, could really be written for Krishnakumar Kunnath’s adieu. https://www.youtube.com/watch?v=NUqlCJTYu6I

But the song that never figured in a movie, and now seems such a spooky premonition. https://www.youtube.com/watch?v=bB2MA2Y46bU

हम रहें या न रहें कल, कल याद आयेंगे ये पल
पल ये हैं प्यार के पल
चल आ मेरे संग चल
चल सोचें क्या छोटी सी है ज़िन्दगी
कल मिल जायें, तो होगी खुश-नसीबी
हम रहें या न रहें कल याद आयेंगे ये पल

हम रहें या न रहें कल, कल याद आयेंगे ये पल
पल ये हैं प्यार के पल
चल आ मेरे संग चल
चल सोचें क्या…

शाम का आंचल ओढ़ के आई देखो वो रात सुहानी
आ लिख दें हम दोनों मिलके अपनी ये प्रेम कहानी
हम रहें या न रहें…

आने वाली सुबह जाने रंग क्या लाये दीवानी
मेरी चाहत को रख लेना जैसे कोई निशानी
हम रहें या न रहें…

Krishnakumar Kunnath was just 53, was popularly known as KK, and recorded songs in at least 10 Indian Languages: Hindi, Tamil, Marathi, Odiya, Gujarati, Assamese, Telugu, Kannada, Malayalam and Bangla. Starting off as a singer of ad jingles, he made a debut with A R Rahman.

In 1999, he launched his debut album, Pal. The songs “Pal” and “Yaaron” from the album have become very popular and are commonly used in school farewells. A man without any formal musical training, KK always considered Leslie Lewis as his mentor for giving him his first jingle to sing.  KK was introduced as a playback singer by A R Rahman with the superhit song “Kalluri Saaley” and “Hello Dr.” from Kadhal Desam by Kadir and then “Strawberry Kannae” from a big banner AVM Production: Minsara Kanavu  He got his solo Bollywood break with “Tadap Tadap” from Hum Dil De Chuke Sanam. He had sung a small portion of the beautiful song “Chhod Aaye Hum” from Maachis made by Gulzar a few years prior.

A shocker and a tragedy that should have been averted by early diagnosis and most importantly resuscitative equipment like AED’s in all public places. I feel the unfortunate and premature demise of one of my favourite singers of the current crop should be utilised to galvanise these efforts.

Let us prove he did not live and die in vain.

Have a good day ahead, folks. Stay happy. I will stay lost in my memories of KK….

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Asha Bhosale Hridaynath Mangeshkar Lata Marathi Poetry

जाज्ज्वल्य देशभक्ताला कोटी कोटी नमन….

१९६७ साली आम्ही तिघे, आई, माझी बहिण व मी, पुण्यात आलो. बाबा हवाई दळातून निवृत्त होणार होते, ती तारीख निश्चित नव्हती म्हणून त्यांनी आम्हाला पुढे पाठवून दिले. मी ६६ पासून एक वर्ष माझ्या सर्वात मोठ्या मावशीकडे राहिलो होतो, त्या वर्षात मी वयाने लहान असूनही खूप काही शिकायला मिळाले. माझे मावसोबा शिस्तप्रिय पण प्रेमळ होते. उगाच शिक्षा कधीच करत नसत. त्यांची आदरयुक्त भीती होती पण त्यांच्या वागण्यातून मला खूप शिकायला मिळाले. उन्हाळ्याच्या सुट्टीत मी आईने दिलेले “माझी जन्मठेप” वाचून काढले, खूप क्लेश आणि दुःख झाले आणि स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर यांच्याविषयी असलेल्या माहितीत खूप भर पडली, आदर शेकडो पटीने वाढला. माझी मोठी आत्या पण पुण्यातच राहात होती. माझे आतोबा म्हणजे हिंदुमहासभेची विचारसरणी मानणारे व कट्टर सावरकरवादी. त्यामुळे त्या वर्षात बाळकडू अगदी मस्त मिळाले.

विनायक दामोदर सावरकर या व्यक्तीबद्दल आणि त्यांच्या विचारांबद्दल खुलासेवार लिहायचे म्हटले तर उरलेले आयुष्यभर मी तेच करत राहीन. एक उत्तुंग व्यक्तिमत्त्व आणि खऱ्या अर्थाने देशभक्तीत समर्पित आयुष्य. तात्यांच्या व्यक्तिमत्त्वाच्या कोणत्याही पैलूचा विचार केला तरी नतमस्तक व्हायला होते आणि स्वतः च्या क्षुद्रपणाची प्रकर्षाने जाणीव होते.

त्यांच्या इंग्लंडमधील वास्तव्यात हे काव्य त्यांनी लिहिले. त्याची पार्श्वभूमी थोडक्यात अशी आहे:

सावरकरांना लोकमान्य टिळकांनी पुरस्कृत करून लंडनला पाठवल होतं. टिळक आणि सावरकर दोघांच्या बुध्दिमत्तेबद्दल तिथे आदर होता. बॅरिस्टरची परीक्षा पास होऊन पदवी दिली न गेलेला तरूण म्हणून सावरकरांबद्दल सहानुभूती होती. India House हे कार्याचे केंद्र. तिथलं वातावरण तर अत्यंत भारलेलं होतं. सर्व क्रांतिकारी तरुण तिथे जमून इंग्रज सरकारच्या नाकावर टिच्चून स्वतः ची सर्व कार्ये करत. मदनलाल धिंग्रा, सावरकर स्वतः सेनापती बापट हे सगळे त्यावेळेला देशप्रमाचं वारं डोक्यात घेऊन वावरणारे स्फूर्तिशील युवक होते. सेनापती बापटांनी बॉम्ब कसा बनवावा याची माहिती असलेले फ्रेंच भाषेतील पुस्तक एक फ्रेंच मैत्रिणीकडून भाषांतरित करून घेतले आणि त्याच्या प्रती सावरकरांनी काढल्या. बाबाराव सावरकरांकडे बॉम्बस्फोटाच्या साहित्याची भाषांतरित प्रत सापडली होती. इतर आरोपांसह त्यांना जन्मठेपेची सजा दिली गेली. कुटुंबाची वाताहत, हाती घेतलेले राष्ट्रकार्य उध्वस्त होऊन आणि स्वतः शंभर टक्के पकडले जाणार आहोत हे त्यांना कळले.  यातून ते अक्षरशः लंडनहून पळून जाऊन ते ब्रायटनच्या किनाऱ्यावर जाऊन बसले. पकडलो गेलो तर परत भारतात पाठवतीलच असं सांगता येत नाही हा अत्यंत अस्वस्थ आणि उद्विग्न करणारा विचार आणि समोर पसरलेला सागर. तो मध्ये आहे म्हणून परत जाऊ शकत नाही. या भावनेतून ते शब्द आले – ‘ने मजसी ने परत मातृभूमीला’ जणू काही ते त्यांचा सगळा राग आणि खिन्नपणा सागरावर काढत आहेत – त्या सागरावर रागावलेला – रूसलेला हा मातृभूमीचा प्रियपुत्र म्हणतो – ‘सागरा, तू खरं तर माझा भूमातेचे पाय धुणारा सेवक आहेस. मी तुला नेहमीच ते करताना पाहिले आहे.

भूमातेच्या चरणतला तुज धूता ।
मी नित्य पाहिला होता


त्यावेळेला मी तिथे , मायदेशी असताना तू मला प्रेमाने म्हणालास  की चल जरा फिरायला जाऊ
दुसऱ्या देशात आणि सृष्टीसौंदर्य पाहू.


मज वदलासी अन्य देशी चल जाऊ ।
सृष्टीची विविधता पाहू

त्याच वेळेला माझ्या आईच्या हृदयात माझा तिला विरह होईल की काय अशी शंका आली.


तैं जननीहृद् विरहशंकितहि झाले परि तुवां वचन तिज दिधले

पण तू तिला वचन दिलंस, की मी मार्गज्ञ म्हणजे वाट माहित असणारा आहे, आणि मी याला अगदी पाठीवरून घेऊन जाईन, आणि लगेच परत घेऊन येईन. तुझ्या बोलण्यावर मी विश्वास ठेवला.  तू जगभर सगळीकडे आहेस त्यामुळे सर्व जगाचा तुला अनुभव असणार हा माझा विश्वास आणि मलाही हा अनुभव मिळावा ही माझी इच्छा या दोन्हीच्या योगे  मी ‘बनलो’ म्हणजे तयार झालो आणि त्या मोहात गुंतून फसलो.

मार्गज्ञ स्वये मीच पृष्ठि वाहीन।
त्वरित या परत आणीन
विश्वसलो या तव वचनी । मी
जगदनुभवयोगे बनुनी । मी

तव अधिक शक्त उद्धरणी । मी

उद्धरणाचा शास्त्रीय अर्थ आणि ‘उद्धार करणे’ याचा प्रचलित अर्थ दोन्हींनी – तुझ्या उद्धरण शक्तीवर जास्त विसंबून मी इथं चांगलाच अडकलो!

‘येईन त्वरे’ कथुन सोडिले तिजला ।
सागरा प्राण तळमळला ।।१।।

लवकर येईन असं सांगून मी मातृभूमीला सोडलं.  पण आता ते आता कधी जमेल हे माहीत नाही म्हणून प्राण तळमळतो आहे.
शुक पंजरि वा हरिण शिरावा पाशी ।
ही फसगत झाली तैशी,

पोपट पिंजऱ्यात किंवा हरिण पारध्याच्या पाशात (जाळ्यात) सापडावा तसा अडकलो.

भू विरह कसा सतत साहू या पुढती ।
दशदिशा तमोमय होती

मातृभूमीचा विरह सतत कसा सहन करू यापुढे ते कळत नाही. सर्व दिशा तमोमय झाल्या म्हणजे अंधःकारमय झाल्या, त्यामुळे मार्ग दिसत नाही असं झालंय.

गुणसुमने मी वेचियली या भावे ।
की तिने सुगंधा घ्यावे
जरि उद् धरणी व्यय न तिच्या हो साचा ।
हा व्यर्थ भार विद्येचा

ती आम्रवृक्षवत्सलता रे नवकुसुमयुता त्या सुलता रे
तो बाल गुलाबहि आता रे फुलबाग मला हाय पारखा झाला ॥

मला आठवतात ती माझ्या देशातील आंब्याच्या बागा आणि झाडे, त्या फुललेल्या सुदंर वेली आणि तिथला छोटा पण सुगंधी गुलाब. त्या फुलबागेला ही मी दुरावलो. त्या आंब्याच्या झाडांच्या वत्सल प्रेमाला ही मी दुरावलो. ही उपमा इंग्लंड मधल्या मोठ्या फुलांना तितका मोहक सुगंध नाही आणि आंब्याचे झाड हे   कुटुंबाचे प्रतीक म्हणून वापरले आहे. त्यातले वात्सल्य इंग्लंडमध्ये नाही.

नभि नक्षत्रे बहुत एक परि प्यारा मज भरतभूमिचा तारा
प्रासाद इथे भव्य परी मज भारी आईची झोपडी प्यारी

आकाशात खूप नक्षत्रे आहेत, पण मला माझ्या मायदेशीचा ताराच जास्त आवडतो. इथे मोठा महाल जरी तुम्ही दिलात तरी घरची झोपडीच मला जास्त आवडते.

तिजवीण नको राज्य मज प्रिया साचा वनवास तिच्या जरि वनिचा

मला मातृभूमीशिवाय राज्य तर नकोच आहे, पण वनवास ही माझ्या नशिबी आला तर मायदेशीच्या वनातलाच मिळो.


भुलविणे व्यर्थ हे आता रे बहु जिवलग गमते चित्ता रे
तुज सरित्पते जी सरिता रे त्वदविरहाची शपथ घालितो तुजला ॥ सागराला सावरकर म्हणतात माझं जिच्यावर प्रेम आहे त्या भारतमातेचा मला विरह घडवशील तर हे सागरा तुझं ज्यांच्यावर प्रेम आहे त्या सरितांचा तुला विरह होईल अशी मी तुला शपथ घालतो. नद्या तुझ्याकडे आल्याच नाहीत तर मग भेट न घडल्याने प्राण तळमळणं म्हणजे काय असतं हे तुलाही कळेल.

या फेनमिषें हससि निर्दया कैसा का वचन भंगिसी ऐसा
त्वत्स्वामित्वा सांप्रत जी मिरवीते भिनि का आंग्लभूमीते

फेसाळलेल्या लाटा सावरकरांना निर्दयपणे हसणाऱ्या वाटतात, त्यांना उद्देशून ते म्हणतात: “माझ्या भारतमातेला तू जे वचन दिलं होतंस, की मी याला परत आणीन, ते भंग करून असा हसतोयस कसा ?” गुलाम जगाकडे पाहून तुच्छतेने हसतात; आणि ते गुलामीवृत्तीचंच हीन प्रदर्शन असतं. तुझं हसणं हे असंच आहे. तुझ्यावर स्वामित्व गाजवणाऱ्या आंग्लभूमीचा तू खरं तर गुलाम. तिला भिऊन राहणाऱ्या सागरा, माझ्या आईला तू अबला समजून फसवतोस आणि मला विदेशवास किंवा विवास घडवतो आहेस.

मन्मातेला अबला म्हणुनि फसवीसी मज विवासनाते देशी


तरि आंग्लभूमी भयभीता रे अबला न माझि ही माता रे
कथिल हे अगस्तिस आता रे जो आचमनी एक क्षणी तुज प्याला ॥

तू इंग्लंडला स्वतः घाबरतोस, पण माझी भारतभूमी ही अबला नाही आहे हे तुला एक दिवस कळेल. पूर्वी अगस्ति ऋषींनी एका आचमनात तुला क्षणार्धात पिऊन टाकले तो प्रसंग तू विसरला आहेस. सागरा, माझा देशाच्या विरहाने तू माझा प्राण तळमळवीत आहेस.

ने मजसी ने परत मातृभूमीला सागरा प्राण तळमळला ॥धृ॥

भूमातेच्या चरणतला तुज धूता मी नित्य पाहिला होता
मज वदलासी अन्य देशि चल जाऊ सृष्टिची विविधता पाहू
तैं जननीहृद् विरहशंकितहि झाले परि तुवां वचन तिज दिधले
मार्गज्ञ स्वये मीच पृष्ठि वाहीन त्वरित या परत आणीन
विश्वसलो या तव वचनी मी जगद्नुभवयोगे बनुनी मी
तव अधिक शक्ती उद्धरणी मी येईन त्वरे कथुनि सोडिले तिजला ॥
सागरा प्राण तळमळला

शुक पंजरि वा हरिण शिरावा पाशी ही फसगत झाली तैशी
भूविरह कसा सतत साहु या पुढती दशदिशा तमोमय होती
गुणसुमने मी वेचियली या भावे की तिने सुगंधा घ्यावे
जरि उद्धरणी व्यय न तिच्या हो साचा हा व्यर्थ भार विद्येचा
ती आम्रवृक्षवत्सलता रे नवकुसुमयुता त्या सुलता रे
तो बाल गुलाबहि आता रे फुलबाग मला हाय पारखा झाला ॥
सागरा प्राण तळमळला

नभि नक्षत्रे बहुत एक परि प्यारा मज भरतभूमिचा तारा
प्रासाद इथे भव्य परी मज भारी आईची झोपडी प्यारी
तिजवीण नको राज्य मज प्रिया साचा वनवास तिच्या जरि वनिचा
भुलविणे व्यर्थ हे आता रे बहु जिवलग गमते चित्ता रे
तुज सरित्पते जी सरिता रे त्वदविरहाची शपथ घालितो तुजला ॥
सागरा प्राण तळमळला

या फेनमिषें हससि निर्दया कैसा का वचन भंगिसी ऐसा
त्वत्स्वामित्वा सांप्रत जी मिरवीते भिनि का आंग्लभूमीते
मन्मातेला अबला म्हणुनि फसवीसी मज विवासनाते देशी
तरि आंग्लभूमी भयभीता रे अबला न माझि ही माता रे
कथिल हे अगस्तिस आता रे जो आचमनी एक क्षणी तुज प्याला ॥
सागरा प्राण तळमळला

स्वातंत्र्यवीर सावरकरांनी हे अप्रतिम काव्य स्वतः ची विरही अवस्था दाखविण्यासाठी लिहिले. त्यावर बाळासाहेब मंगेशकर यांनी स्वरसाज चढविला आणि सर्व मंगेशकरांनी ते एकत्र गायले आणि मराठी भाषिकांना एक अप्रतिम भेट दिली. सर्व भावंडांनी एकत्र म्हटलेली अशी निवडकच गाणी आहेत, हे निर्विवाद पणे त्यातलं सर्वोच्च आहे.

आज स्वातंत्र्यवीर सावरकरांचा १३९ वा वाढदिवस! त्यांच्या ओजस्वी पण संवेदनशील लेखणीतून उतरलेले एक हृदयस्पर्शी विरहगीत,मला जेव्हढे आवडते तेव्हढेच तुमच्या पसंतीस उतरेल अशी आशा करतो.

स्वातंत्र्यवीरांना भारतरत्न मिळावे हीच ईश्वरचरणी प्रार्थना. त्यांच्याइतके देशावर निरलस आणि निर्मोही प्रेम कोणीही केले नसेल.

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Couplet for the day Environment Human Tales

बस यूँही…….

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A wonderful cityscape of Shimla taken in the Golden Hour, sent by a dear friend Shri Anoop Sood spurred these thoughts. In large urban areas we eke our existences cloaked in faceless anonymity. We might be headed in the same direction without any shared purpose, and in the last few years, each person lost in a personal device somewhat paradoxically called a smartphone, one that has led to a greater dumbing down of basic intellect of people.
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#Cityscapes,
#Twilight_Hour,
#Nature,
#Introspection,
#Beauty_Around_Us